
◆ 2027 में सहसवान में किसका परचम? सपा की पकड़ या भाजपा की बढ़ती ताकत।
प्रवाह ब्यूरो
बदायूं। बदायूं जनपद की 113 नंबर सहसवान विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की उन चुनिंदा सीटों में गिनी जाती है, जहां राजनीति केवल चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका रिश्ता इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समीकरणों से भी जुड़ा हुआ है। दशकों से समाजवादी पार्टी के प्रभाव वाली इस सीट पर अब बदलते राजनीतिक समीकरणों ने 2027 के चुनाव को दिलचस्प बना दिया है।
सहसवान की पहचान केवल एक विधानसभा क्षेत्र के रूप में नहीं रही है। माना जाता है कि सहसवान नाम का संबंध प्राचीन सहस्त्रजून से है, जिसकी ऐतिहासिक कड़ियां सम्राट महेशमती राज्य से जोड़ी जाती हैं। यह क्षेत्र भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में भी अपनी अलग पहचान रखता है। पद्म भूषण से सम्मानित मशहूर संगीतकार मुस्ताक हुसैन खान के परिवार की जड़ें इसी क्षेत्र से जुड़ी रही हैं। उनके भाई इनायत हुसैन खान हैदर खान और फिदा हुसैन खान भी सहसवान से थे। इन्हीं के कारण प्रसिद्ध रामपुर सहसवान घराना को पहचान मिली।

राजनीतिक रूप से देखें तो सहसवान विधानसभा लंबे समय से समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ रही है। करीब चार लाख मतदाताओं वाली इस सीट को यादव और मुस्लिम बहुल क्षेत्र माना जाता है। इसके अलावा मौर्य, शाक्य, ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य और दलित मतदाता भी चुनावी परिणामों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही सामाजिक समीकरण यहां के चुनाव को हमेशा रोचक बनाए रखते हैं।
अगर चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो 1991 में जनता दल के ओमकार सिंह यादव यहां से विधायक चुने गए थे। इसके बाद 1993 में सपा के मीर मजहर अली ने जीत दर्ज की। वर्ष 1996 में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने इस सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की, लेकिन बाद में सीट से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1997 में हुए उपचुनाव में सपा ने ओमकार सिंह यादव पर भरोसा जताया और वे विजयी रहे। ओमकार सिंह यादव ने आगे चलकर 2002, 2012 और 2017 में भी जीत हासिल की। हालांकि 2007 में उन्हें डीपी यादव के हाथों हार का सामना करना पड़ा था।
2017 के विधानसभा चुनाव में सपा के ओमकार सिंह यादव ने बीएसपी के मुसर्त अली बिट्टन को 4,269 वोटों से हराया था। वहीं राष्ट्रीय परिवर्तन दल की उमलेश यादव तीसरे स्थान पर रहीं, जबकि भाजपा प्रत्याशी आशुतोष वार्ष्णेय 24,152 वोटों के साथ चौथे स्थान पर रहे।
लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव ने यहां एक नया राजनीतिक संकेत दिया। सपा उम्मीदवार बृजेश यादव ने भले ही जीत दर्ज की, लेकिन भाजपा ने अपने वोट प्रतिशत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की। भाजपा उम्मीदवार डी.के. भारद्वाज जीत नहीं सके, हालांकि पार्टी ने 2017 की तुलना में लगभग ढाई गुना वोट बढ़ाकर राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके बावजूद भाजपा तीसरे स्थान पर रही और बसपा प्रत्याशी मुर्शद अली उनसे लगभग तीन हजार वोट आगे रहे।
अब 2027 के चुनाव को लेकर चर्चाएं तेज हैं। एक तरफ सपा अपने पारंपरिक जनाधार और मजबूत पकड़ को बरकरार रखने की चुनौती से जूझेगी, तो दूसरी तरफ भाजपा पिछले चुनाव में मिली वोट वृद्धि को जीत में बदलने की कोशिश करेगी।
अब सवाल यह है कि क्या सहसवान में एक बार फिर समाजवादी पार्टी अपना परचम लहराएगी, या भाजपा यहां दशकों पुरानी राजनीतिक परंपरा को तोड़कर नया इतिहास लिखेगी? आने वाला चुनाव इस सवाल का जवाब तय करेगा।
■ प्रवाह के लिए सहसवान संवाददाता की खास रिपोर्ट…