
◆ पीड़ित परिवार का दावा: गलत टेस्ट कोड दर्ज करने के कारण समय पर नहीं मिल सकी डॉ. लाल पैथलैब रिपोर्ट।
◆ लैब पर आरोपों के बीच पीड़िता ने डीएम व सीएमओ से लगाई गुहार।
प्रवाह ब्यूरो
अलीगढ। यूपी एक अलीगढ में एक निजी पैथोलॉजी लैब पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगने से स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही शिकायत के अनुसार, डॉ. लाल पैथलैब की कथित तकनीकी गलती के कारण जनपद संभल के तहसील गुन्नौर के बहीपुर निवासी एक 35 वर्षीय महिला मरीज मीना की महत्वपूर्ण हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट पिछले 10 दिनों से लंबित है, जिससे उसके इलाज में देरी हो रही है और स्वास्थ्य स्थिति लगातार बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है।
संभल के गुन्नौर तहसील निवासी पीड़ित परिवार का आरोप है कि लैब में “रॉन्ग टेस्ट कोड” दर्ज होने की वजह से रिपोर्ट समय पर तैयार नहीं हो सकी। परिजनों का कहना है कि रिपोर्ट में देरी के कारण डॉक्टरों को उपचार शुरू करने में कठिनाई हो रही है, जिससे मरीज के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

परिवार का दावा है कि उन्होंने कई बार लैब प्रबंधन से संपर्क किया, लेकिन हर बार टालमटोल होती रही और समस्या का समाधान आज तक नहीं हुआ। आरोप है कि जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय लैब प्रबंधन मामले को टालने का प्रयास कर रहा है। सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया है कि संबंधित मरीज रीढ़ और हड्डियों से जुड़ी गंभीर बीमारी (प्लाज्मा सेल संबंधी रोग) से पीड़ित है। ऐसे मामलों में समय पर जांच रिपोर्ट और उपचार को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। चिकित्सकीय विशेषज्ञों के अनुसार, गंभीर रोगों में प्रत्येक दिन मरीज की स्थिति पर प्रभाव डाल सकता है, इसलिए जांच रिपोर्ट में अनावश्यक देरी चिंता का विषय है।

परिजनों का कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो वे मामले की शिकायत जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी तथा उपभोक्ता आयोग में करेंगे। वहीं पीड़िता के पति का कहना है स्वास्थ्य सेवाओं में हुई कथित लापरवाही के लिए संबंधित संस्था की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
हालांकि, इस पूरे मामले में अभी तक संबंधित लैब प्रबंधन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। वहीं मामले की वास्तविक स्थिति और जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित अधिकारियों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
खैर जो भी हो, यह बाद की बात है लेकिन वर्तमान में यह मामला एक बार फिर निजी स्वास्थ्य संस्थानों में गुणवत्ता नियंत्रण, मरीजों के अधिकार और समयबद्ध रिपोर्टिंग जैसे मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ले आया है।