
◆ बेटियों के साहस ने बदली परंपरा, अंतिम यात्रा में हौसला देख भावुक हुआ गांव।
प्रवाह ब्यूरो
पटना। बिहार के हाजीपुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने समाज की पुरानी सोच को झकझोर दिया है। जहां अक्सर माना जाता है कि पिता की अर्थी को बेटा ही कंधा देता है, वहीं वैशाली के नया टोला गांव में पांच बेटियों ने इस परंपरा को बदलते हुए इंसानियत, जिम्मेदारी और रिश्तों की नई मिसाल पेश की।
वैशाली थाना क्षेत्र के नया टोला गांव में पिता के निधन के बाद घर में मातम पसरा था। रिश्तेदार और गांव वाले अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुटे थे। इसी बीच परिवार की पांचों बेटियां आगे आईं और पिता की अर्थी को खुद कंधा देने का फैसला किया।
गांव की गलियों से जब बेटियां अपने पिता की अर्थी को कंधा देकर श्मशान घाट की ओर बढ़ीं, तो यह दृश्य हर किसी को भावुक कर गया। लोगों की आंखें नम थीं, लेकिन बेटियों के हौसले और अपने पिता के प्रति प्रेम ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया।
इतना ही नहीं, बेटियों ने पूरे रीति-रिवाज के साथ अंतिम संस्कार की सभी रस्में भी निभाईं। समाज में बेटा-बेटी के फर्क को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने यह संदेश दिया कि जिम्मेदारियां निभाने के लिए सिर्फ बेटा होना जरूरी नहीं, बल्कि दिल में अपने माता-पिता के लिए सम्मान और प्रेम होना चाहिए।
गांव के लोगों का कहना है कि बेटियों ने जो किया, वह पूरे समाज के लिए प्रेरणा है। यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि बेटियों के सम्मान और बदलती सोच की मिसाल है।हाजीपुर की ये पांच बेटियां आज उन तमाम लोगों के लिए जवाब बन गई हैं, जो अब भी बेटा और बेटी में फर्क करते हैं। क्योंकि रिश्तों का असली मूल्य परंपराओं से नहीं, बल्कि निभाए गए फर्ज से तय होता है।