◆ संवाद, नवाचार और समर्पण से बदली स्कूल की तस्वीर, शिक्षा के साथ संस्कार-संस्कृति को बनाया मिशन।
प्रवाह ब्यूरो
संभल। गुन्नौर तहसील के रसूलपुर गांव स्थित कंपोजिट प्राथमिक विद्यालय ने शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐसी प्रेरक कहानी लिखी है, जिसकी गूंज अब राजधानी लखनऊ तक पहुंच गई है। कभी कम नामांकन और कमजोर उपस्थिति से जूझ रहे इस विद्यालय को नई पहचान दिलाने वाले प्रधानाध्यापक ब्रज किशोर को उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए राज्य अध्यापक पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। शिक्षक दिवस के अवसर पर 5 सितंबर को लखनऊ में आयोजित समारोह में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया जाएगा।
ब्रज किशोर फरवरी 2009 में बेसिक शिक्षा विभाग से जुड़े और वर्ष 2015 में प्रधानाध्यापक बने। रसूलपुर विद्यालय की जिम्मेदारी संभालने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बच्चों को विद्यालय से जोड़ने और अभिभावकों का भरोसा जीतने की थी। उन्होंने इसे केवल विभागीय जिम्मेदारी न मानकर एक मिशन के रूप में लिया।
ब्रज किशोर ने साथी शिक्षकों के साथ मिलकर सबसे पहले विद्यालय में बच्चों के नामांकन और नियमित उपस्थिति बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया। इसके लिए उन्होंने विद्यालय प्रबंध समिति (एसएमसी) के अध्यक्ष और अभिभावकों के साथ लगातार संवाद और बैठकें शुरू कीं। बच्चों और उनके परिवारों की समस्याओं को समझा तथा अभिभावकों को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक किया।

ब्रज किशोर का मानना है कि किसी भी बच्चे को सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं और पारिवारिक परिस्थितियों को समझकर शिक्षा से जोड़ा जा सकता है। उनके इसी दृष्टिकोण का असर धीरे-धीरे विद्यालय में दिखाई देने लगा। जिसके बाद नामांकन और उपस्थिति लगातार बढ़ती गई और आज विद्यालय में 425 बच्चे अध्ययनरत हैं।
खास बात यह है कि विद्यालय में छात्राओं का नामांकन छात्रों की तुलना में अधिक है, जो ग्रामीण क्षेत्र में बालिका शिक्षा के प्रति बदलती सोच की मिसाल भी है।
ब्रज किशोर ने केवल बच्चों की संख्या बढ़ाने तक अपने प्रयास सीमित नहीं रखे। उन्होंने स्थानीय लोगों के सहयोग से विद्यालय में आरओ सिस्टम, वाटर कूलर, सीसीटीवी कैमरे और दो स्मार्ट क्लास जैसी सुविधाएं विकसित कराईं। नरौरा से प्राप्त सीएसआर फंड के माध्यम से भी विद्यालय में कई विकास कार्य कराए गए।

आज रसूलपुर का यह सरकारी विद्यालय अपनी सुविधाओं, स्वच्छ वातावरण और शैक्षिक माहौल के कारण किसी अच्छे कॉन्वेंट स्कूल से कम नजर नहीं आता। बेहतर सुविधाओं और पढ़ाई के माहौल से बच्चे उत्साहित हैं तो अभिभावकों में भी विद्यालय के प्रति विश्वास बढ़ा है।
विद्यालय में शिक्षा को रोचक और व्यवहारिक बनाने के लिए विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। बाल नाटकों के माध्यम से छात्राओं को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक किया जाता है। बच्चों को भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने के लिए विद्यालय में विभिन्न त्योहार भी उनके साथ मिलकर मनाए जाते हैं। इन प्रयासों ने विद्यालय को केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं रहने दिया, बल्कि उसे गांव और समाज के बीच एक सक्रिय एवं प्रेरणादायक शैक्षिक केंद्र के रूप में स्थापित किया।
राज्य अध्यापक पुरस्कार मिलने पर ब्रज किशोर इसे उपलब्धि के साथ-साथ नई जिम्मेदारी भी मानते हैं। उनका कहना है कि सम्मान मिलने के बाद उनकी जिम्मेदारी और चुनौतियां दोनों बढ़ गई हैं। वह भविष्य में छात्रों की भलाई के लिए और अधिक उत्साह के साथ काम करना चाहते हैं।
उनका लक्ष्य बच्चों को भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप शिक्षा देने के साथ-साथ उनमें अच्छे संस्कार विकसित करना है, ताकि विद्यार्थी आत्मनिर्भर बनने के साथ समाज और देश के जिम्मेदार नागरिक भी बन सकें।

ब्रज किशोर ने शिक्षा के क्षेत्र में अपने दृष्टिकोण को और समृद्ध करने के लिए दो बार विशेष प्रशिक्षण भी लिया है। उनके अनुसार तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ. राजेंद्र पेंसिया ने पहली बार उन्हें विद्यापीठ से जोड़ा था। वहां प्रतिदिन सुबह 5 से 6 बजे तक अध्ययन होता है। इस प्रशिक्षण में शिक्षा को भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप देने, भारतीय परंपराओं और संस्कारों का सम्मान करने तथा विद्यार्थियों के साथ-साथ स्वयं शिक्षक के व्यक्तित्व में भी संस्कार विकसित करने पर विशेष जोर दिया जाता है।
ब्रज किशोर की अपनी शैक्षिक यात्रा भी संघर्ष और निरंतर प्रयासों से भरी रही है। उन्होंने विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और मुख्य परीक्षा तक पहुंचे, लेकिन अंतिम चयन नहीं हो सका।
उन्होंने वर्ष 2001 में बीटीसी किया और फरवरी 2009 में बेसिक शिक्षा विभाग में सेवा शुरू की। वह बताते हैं कि यूपीएससी में उन्हें आंशिक सफलता मिली, लेकिन अंतिम चयन न होने और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उन्हें बेसिक शिक्षा विभाग में आना पड़ा।
ब्रज किशोर कहते हैं कि वह एक मध्यवर्गीय परिवार से आते हैं और उन्हें माता-पिता से अच्छी शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार मिले। आज वही संस्कार वह अपने विद्यार्थियों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
एक शिक्षक के रूप में ब्रज किशोर की कहानी यह संदेश देती है कि संसाधनों की कमी किसी विद्यालय की पहचान तय नहीं करती। सही सोच, निरंतर प्रयास, अभिभावकों का विश्वास और बच्चों के प्रति समर्पण हो तो एक साधारण सरकारी स्कूल भी पूरे समाज के लिए प्रेरणा का केंद्र बन सकता है।
