◆ रिटायर्ड एसडीएम, पूर्व डीजीसी समेत 6 गिरफ्तार, 19 पर मुकदमा।
◆ गुन्नौर में गंगा किनारे करोड़ों की सरकारी जमीन पर फर्जी पट्टों का बड़ा खेल आया सामने।
प्रवाह ब्यूरो
संभल। 101 करोड़ के फर्जी पट्टों का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था, तभी संभल में 1000 बीघा सरकारी जमीन घोटाले के नए खुलासे ने प्रदेशभर में हलचल मचा दी। एक के बाद एक सामने आ रहे जमीन आवंटन के मामलों ने प्रशासनिक व्यवस्था और राजस्व तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शुक्रवार को संभल में गंगा किनारे स्थित 1000 बीघा से अधिक सरकारी जमीन के कथित अवैध आवंटन मामले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। रिटायर्ड एसडीएम, पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (डीजीसी), पूर्व ग्राम प्रधान समेत छह आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। इस मामले में वर्तमान एसडीएम सहित कुल 19 लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। जिनमें धोखाधड़ी, कूटरचना और आपराधिक षड्यंत्र सहित विभिन्न धाराओं में लेखपाल स्वाति शर्मा की तहरीर पर थाना गुन्नौर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471, 34 और 120-बी के तहत एफआईआर दर्ज की है।

यह पूरा मामला गुन्नौर तहसील के असदपुर, सुखैला और आसपास के गांवों में गंगा किनारे स्थित झाऊ श्रेणी की सरकारी भूमि से जुड़ा है। आरोप है कि सरकारी जमीन के रिकॉर्ड में फर्जी दस्तावेजों और कथित कूटरचना के जरिए बड़े स्तर पर हेरफेर कर अवैध आवंटन किया गया।
लेखपाल स्वाति शर्मा की शिकायत पर थाना गुन्नौर में धोखाधड़ी, कूटरचना, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र जैसी गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई। मुकदमे में रिटायर्ड एसडीएम ओमवीर सिंह, तत्कालीन तहसीलदार करम सिंह, पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता जय भारद्वाज, तत्कालीन ग्राम प्रधान विक्रांत सहित कुल 19 लोगों को नामजद किया गया है।
पुलिस ने शुक्रवार को ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए रिटायर्ड एसडीएम ओमवीर सिंह, पूर्व ग्राम प्रधान विक्रांत, तत्कालीन चकबंदी लेखपाल भीमराव सिंह, पूर्व डीजीसी जय भारद्वाज, पूर्व कानूनगो राजवीर सिंह और रिटायर्ड चकबंदी अधिकारी महेंद्र सिंह को गिरफ्तार कर लिया। मेडिकल परीक्षण के बाद सभी को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।

जांच में सामने आया कि ग्राम सुखैला की करीब 71.55 हेक्टेयर यानी लगभग 1000 बीघा सरकारी भूमि में वर्ष 2007 के बाद कथित तौर पर फर्जी अभिलेख तैयार कर अवैध प्रविष्टियां की गईं। चौंकाने वाली बात यह रही कि वर्ष 2018 में भी इसी मामले में कार्रवाई हुई थी और फर्जी प्रविष्टियां निरस्त कर दी गई थीं। इसके बावजूद वर्ष 2019 में दोबारा 162 लाभार्थियों के पक्ष में पट्टे स्वीकृत कर दिए गए।
बाद की जांच में लाभार्थियों की संख्या और भूमि क्षेत्रफल में गंभीर गड़बड़ियां सामने आईं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि ग्राम सभा की खुली बैठक, सहमति और लॉटरी जैसी अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। इतना ही नहीं, वर्ष 2023 में कई पट्टे निरस्त होने के बावजूद रिकॉर्ड में लाभार्थियों के नाम बने रहे।
4 जून 2026 को जांच समिति ने जिलाधिकारी को अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की सिफारिश की थी। इसी आधार पर 2 जुलाई को मुकदमा दर्ज हुआ और अब पुलिस कार्रवाई तेज हो गई है।
सरकारी जमीन आवंटन से जुड़े इस मामले ने एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था और भूमि रिकॉर्ड प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में कई और बड़े नाम सामने आने की संभावना जताई जा रही है।
